भूमिका
भगवद गीता जीवन का शाश्वत ग्रंथ है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने न केवल अर्जुन को धर्म और कर्तव्य का बोध कराया, बल्कि हर इंसान को जीवन जीने की सही दिशा भी बताई।
छठा अध्याय “ध्यान योग” कहलाता है। यह अध्याय मनुष्य के आंतरिक अनुशासन, साधना, संयम और आत्मिक शांति के महत्व को प्रकट करता है।
माता-पिता और बच्चों के जीवन में यह अध्याय विशेष महत्व रखता है। क्योंकि—
माता-पिता को अपने बच्चों के लिए धैर्य, संयम और अनुशासन का आदर्श प्रस्तुत करना होता है।
वहीं बच्चों को माता-पिता का सम्मान और जीवन में अनुशासन का पालन करना होता है।
अध्याय 6 का सार

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि—
- जो मनुष्य कर्तव्य करते हुए भी फल की इच्छा का त्याग करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है।
- योग का अर्थ केवल आसन या साधना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म का सामंजस्य है।
- ध्यान योग से मनुष्य स्वयं को पहचान सकता है और परमात्मा से जुड़ सकता है।
- सच्चा योगी वही है जो सबमें समान भाव रखता है – मित्र, शत्रु, ज्ञानी, अज्ञानी, गरीब, अमीर सबमें।
- आत्मसंयम, संतुलन और समर्पण से ही सच्ची सफलता मिलती है।

माता-पिता के लिए शिक्षा
गीता का यह अध्याय माता-पिता को यह सिखाता है कि—
धैर्य और संयम रखें – बच्चों को संस्कार देने में समय लगता है। गुस्सा और दबाव से नहीं, बल्कि धैर्य और प्रेम से मार्गदर्शन करें।
अनुशासन का आदर्श बनें – बच्चे माता-पिता से सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं अनुशासित, ईमानदार और संयमी होंगे, तो बच्चे स्वतः वैसा बनेंगे।
ध्यान का अभ्यास – व्यस्त जीवन में माता-पिता यदि थोड़े समय ध्यान और प्रार्थना में लगाएंगे, तो मानसिक शांति पाएंगे और बच्चों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
समानता का भाव – बच्चों के बीच तुलना न करें। हर बच्चा ईश्वर की अद्भुत रचना है।
बच्चों के लिए शिक्षा
माता-पिता का आदर करें – उनका त्याग, सेवा और समर्पण अमूल्य है।
आत्मसंयम सीखें – गीता बच्चों को सिखाती है कि इच्छाओं के पीछे भागने से जीवन अस्थिर होता है। संयम से ही चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
योग और ध्यान अपनाएँ – पढ़ाई के साथ-साथ ध्यान से मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है।
समानता और करुणा – अपने मित्रों, सहपाठियों और छोटे-बड़ों के साथ समानता और दयालुता का व्यवहार करें।
छोटी कहानी – “ध्यान का असली अर्थ”
एक नगर में एक बालक अपने पिता से रोज़ कहता –
“पिताजी, मैं भी साधु बनना चाहता हूँ। मैं जंगल जाकर ध्यान करूँगा।”
पिता मुस्कुराए और बोले –
“ठीक है, पहले तुम घर पर ध्यान का अभ्यास करो।”
बालक ने कमरे में बैठकर आँखें बंद कीं, पर थोड़ी देर बाद चिल्लाया –
“पिताजी! ध्यान लग नहीं रहा, बार-बार खेल और दोस्तों का ख्याल आ रहा है।”
पिता ने कहा –
“बेटा, ध्यान केवल आँखें बंद करना नहीं है। जब तुम अपना होमवर्क मन लगाकर करते हो, जब तुम माता की बात ध्यान से सुनते हो, जब तुम बिना लालच के मित्र की मदद करते हो – वही ध्यान है। ध्यान का अर्थ है मन को पूरी तरह किसी अच्छे काम में लगाना।”
बालक को समझ आ गया कि ध्यान केवल साधुओं का काम नहीं, बल्कि हर रोज़ का अभ्यास है।

आधुनिक जीवन में प्रयोग
आज माता-पिता और बच्चों दोनों को तनाव, व्यस्तता और प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में—
माता-पिता ध्यान और अनुशासन से घर का वातावरण शांत बना सकते हैं।
बच्चे ध्यान योग से एकाग्रता और सकारात्मक सोच विकसित कर सकते हैं।
परिवार मिलकर प्रतिदिन 10 मिनट प्रार्थना या ध्यान करे, तो आपसी प्रेम और शांति बढ़ती है।
माता-पिता और बच्चों का रिश्ता – अध्याय 6 की दृष्टि से भगवद गीता अध्याय 8 – अक्षर ब्रह्म योग
- योग का अर्थ संतुलन है – माता-पिता को बच्चों को संतुलित जीवन सिखाना चाहिए – पढ़ाई, खेल, भक्ति और पारिवारिक समय में।
- ध्यान से संवाद सुधरता है – ध्यान अभ्यास से गुस्सा और क्रोध कम होते हैं, जिससे माता-पिता और बच्चों के बीच संबंध मधुर होते हैं।
- समानता का भाव – माता-पिता बच्चों को यह सिखाएँ कि सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं, इसलिए किसी से भेदभाव न करें।
माता-पिता क्या करें?
बच्चों को ध्यान और योग की आदत डालें।
घर में मिलकर गीता पाठ करें।
बच्चों के साथ समय बिताएँ और उनकी बातें ध्यान से सुनें।
उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे हर काम मन लगाकर करें।
बच्चों को क्या करना चाहिए?
माता-पिता की सेवा को ईश्वर की पूजा मानें।
पढ़ाई और खेल दोनों में अनुशासन बनाए रखें।
हर दिन कुछ समय प्रार्थना और ध्यान में बिताएँ।
माता-पिता के त्याग और प्रेम के लिए आभार प्रकट करें।
निष्कर्ष
भगवद गीता का छठा अध्याय माता-पिता और बच्चों दोनों के लिए गहरा संदेश देता है –
योग केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन का संतुलन है।
माता-पिता यदि संयम, अनुशासन और समानता का आदर्श प्रस्तुत करें, तो बच्चे भी उसी मार्ग पर चलेंगे।
बच्चों के लिए सबसे बड़ा ध्यान और योग है – माता-पिता का सम्मान और सेवा।
यदि हम सब गीता के इस अध्याय की शिक्षा को अपनाएँ, तो परिवार ही नहीं, पूरा समाज संस्कारी और संतुलित बन सकता है।
✍ लेखिका – मोनिका
Sanatan Sanskaar Vidya Gurukulam
