
धर्म | कला | संस्कार | देशभक्ति | आध्यात्मिक पालन–पोषण
लेखिका: मोनिका गुप्ता
बच्चे एक कोमल कमल बेल के समान होते हैं, जो सही देखभाल और उचित मार्गदर्शन से अत्यंत सुंदर रूप में फलते–फूलते हैं। जिस प्रकार कपड़े धोने के लिए साबुन और पानी—दोनों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार बच्चों के समग्र विकास के लिए शिक्षा और संस्कार—दोनों का संतुलन अनिवार्य है। केवल किताबी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि सही संस्कार ही जीवन को दिशा और उद्देश्य प्रदान करते हैं।
हमने कई बार देखा है कि कभी–कभी शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति भी अपने आत्मबल, संस्कार और दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे जीवन की ऊँचाइयों को छू लेते हैं। इसलिए बच्चों को यह सिखाना अत्यंत आवश्यक है कि जीवन का लक्ष्य केवल धन अर्जन नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अब प्रश्न यह उठता है कि संस्कार मिलते कहाँ से हैं?
संस्कार बच्चों को विरासत में प्राप्त होते हैं। वे अपने माता–पिता को देखकर, उनके व्यवहार और जीवनशैली से सीखते हैं। बच्चे के पालन–पोषण में माँ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बच्चा सबसे पहले माँ के आचरण, वाणी और भावनाओं से ही सीखता है।
बच्चों को हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य से अवश्य परिचित कराना चाहिए—जैसे श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण और संतों के अमृत वचन। गीता अपने आप में एक पूर्ण जीवन–ग्रंथ है, जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल एक युग के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं। यह ग्रंथ जीवन के हर संघर्ष में सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।
माँ का यह कर्तव्य है कि वह प्रातः और संध्या घर में भजन, कीर्तन और सकारात्मक धार्मिक वातावरण बनाने का प्रयास करे। बच्चों को भक्ति गीत सुनाना, भगवान की प्रेरक कथाएँ बताना और सोते समय ध्यान करने की आदत डालना उनके मन को शांत, एकाग्र और संस्कारवान बनाता है। विद्यालय जाते समय दादा–दादी, माता–पिता का आशीर्वाद लेने की परंपरा बच्चों में विनम्रता और संस्कारों की जड़ें मजबूत करती है।
आज के कलियुग में अंग्रेज़ी शिक्षा और भौतिकता के प्रभाव से संस्कार धीरे–धीरे कम होते जा रहे हैं। ऐसे समय में माता–पिता का यह कर्तव्य बनता है कि वे पहले स्वयं सनातन धर्म का पालन करें और फिर अपने आचरण से बच्चों को ध्यान, भक्ति और सेवा के मार्ग से जोड़ें।
सनातन संस्कार विद्या गुरुकुलम का उद्देश्य भी यही है—
बच्चों में धर्म, कला, संस्कार और देशभक्ति की भावना जागृत कर उन्हें एक सशक्त, संवेदनशील और आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में विकसित करना।
संस्कारों से सजी शिक्षा ही बच्चों को सच्चे अर्थों में महान बनाती है।
